وہ کہہ دیتی ہے:
"मैं ठीक हूँ"

मगर कौन समझे कि इस "ठीक" के अंदर कितनी थकान छुपी होती है? कितनी खामोश दुआएँ, कितनी दबाई हुई आहें और कितनी अनकही ख्वाहिशें?
रात का आखिरी पहर…
घर भर में नींद का सुकून होता है, मगर वो जाग रही होती है। आँखें बोझल, जिस्म थका हुआ, मगर जिम्मेदारी उसे उठा देती है। बावर्ची खाने की मध्यम रोशनी में वो सहरी तैयार करती है। रोटियाँ बनती हैं, सालन गरम होता है, चाय की भाप उठती है। सबको जगाती है, प्यार से आवाज देती है। सब खा लेते हैं, मुतमईन हो जाते हैं। और वो?
वो आखिर में बचा हुआ समेट कर अपने रोजे की नीयत कर लेती है।
फजर की नमाज अदा करने के बाद तिलावत और जिक्र व अज्कार करते करते इशराक का वक्त हो जाता है फिर इशराक पढ़ने के बाद अगर आँख लग भी जाए तो ज्यादा देर नहीं। बच्चों की आवाजें, स्कूल की तैयारी, शौहर का दफ्तर, यूनिफार्म, जूते, बस्ते, नाश्ता…वगैरह
 वो एक लम्हे को भी खुद के लिए नहीं जीती।
दिन भर वो घर को संभालती है, सफाई, बर्तन, कपड़े, तरतीब… हर शय में उसकी मेहनत बोलती है। फिर शाम ढलती है और इफ्तार की तैयारी शुरू हो जाती है। फ्रूट, पकोड़े, शरबत, चाट… सब के जौक का ख्याल, सब की पसंद का लिहाज। अजान होती है, सब दस्तरखान पर बैठते हैं। वो नजरें घुमा घुमा कर देखती है कि किसी को किसी चीज की कमी न रह जाए।
और अगर कभी कुछ रह जाए?
"नमक ज्यादा था।"
"पकोड़े करारे नहीं थे।"
"आज वो चीज क्यों नहीं बनी?"

वो खामोश रहती है। क्योंकि उसे आदत है।
शायद इसलिए कि उसकी मोहब्बत शोर नहीं मचाती।
कभी किसी ने सोचा कि उसके भी ख्वाब हैं? उसकी भी ख्वाहिश है कि कोई उससे पूछे:
"तुम थक तो नहीं गई?"
"आज बैठ जाओ, हम कर लेते हैं।"
इस्लाम ने औरत को इज्जत दी, मकाम दिया।
  हजरत मोहम्मद ﷺ ने फरमाया कि तुम में बेहतरीन वो है जो अपने घर वालों के लिए बेहतरीन हो।
मगर हम में से कितने लोग इस तालीम पर अमल करते हैं?
माँ हो, बीवी हो या बहन ۔۔۔ वो मशीन नहीं, इंसान है। उसे हुक्म नहीं, एहतराम चाहिए। उसे तनकीद नहीं, तारीफ चाहिए। उसे बोझ नहीं, सहारा चाहिए।
अगर यकीन न आए तो एक दिन उसकी जगह ले कर देख लीजिए। तब मालूम होगा कि घर संभालना कितना आसान या कितना मुश्किल है।
आज अगर आप की माँ, बीवी या बहन थकी हुई लगे
तो सिर्फ इतना कर लीजिए।
उसके हाथ थाम लीजिए।
उसके माथे पर हाथ रख कर कहिए:
"आप की वजह से हमारा घर घर है।"
क्योंकि औरत सिर्फ जिम्मेदारी नहीं,
वो दिल है।
और जब दिल टूट जाए
तो घर सिर्फ मकान रह जाता है। 
आइए! आज से अहद करें....
हम अपनी औरतों की कद्र करेंगे।
उनके लिए मोहब्बत के चंद अल्फाज कहेंगे।
क्योंकि वो भी दिल रखती हैं।
और वो भी इज्जत और सुकून की हकदार हैं।
🪶आज: ह आइशा✰