मानवीय गरिमा की मांग है कि हर बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश न की जाए। याद रखें! हर मामला आपके हल करने के लिए नहीं होता। कुरान मजीद में अल्लाह ताला का इरशाद है:
وَالَّذِينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَ  "और वो (मोमिनीन) जो लग्व (बे मकसद) बातों से एअराज़ बरतते हैं।" (सूरह अल-मोमिनून: 3)
फ़ज़ूल गोई और बेजा मुदाख़लत से परहेज़ करें ।

            किसी की ज़िन्दगी के बंद दरवाज़ों के पीछे झांकना या बिन बुलाए मशवरे देना न सिर्फ अख़लाक़ी तौर पर ग़लत है बल्कि ये आपकी अपनी क़द्र में भी कमी लाता है। जब तक कोई आप से अपनी तकलीफ़ या मामला शेयर न करे, तब तक उस से बे ख़बर रहना ही दानिशमंदी  और आफ़ियत है।
निजी ज़िन्दगी (Privacy) का एहतराम करें।
             आप में क़ाबिलियत है, इस में कोई शक नहीं, लेकिन हर जगह अपनी क़ाबिलियत का मुज़ाहिरा करना ज़रूरी नहीं। कुछ मामलात ऐसे होते हैं जहां ख़ामोशी, मुदाख़लत से ज़्यादा बाअसर होती है। खुद को हर मसले का ज़िम्मेदार समझ कर ज़ेहनी अज़ीयत में न डालें। अपनी इस्तिदाद का सही इदराक करें।

          अल्लाह ताला ने आप की मेहनत और क़ाबिलियत का सिला आप के लिए मुक़र्रर कर रखा है। ग़ैर ज़रूरी मुशक्कत और दूसरों के कामों में हलकान होने से मंज़िल क़रीब नहीं आती। अल्लाह पर भरोसा रखें, वो आप को आप की सलाहियत के मुताबिक़ "मंसब-ए-आला" पर फ़ाइज़ कर देगा। 
           
          अपनी ज़ात को अहमियत (Value) दें। जो इंसान अपनी क़द्र करता है, वो दूसरों की खुशियों में मुख़िल नहीं होता। दूसरों को सांस लेने का मौका दें और अपनी ज़िन्दगी में भी सुकून के दीये जलाएं। खुश अख़लाक़ी और खुद पसंदी से दूरी बनाएं।

      इस नसीहत का लुब-ए-लुबाब नबी करीम ﷺ  की ये हदीस मुबारक है,
हदीस पाक का मफ़हूम है कि
"مِنْ حُسْنِ إِسْلَامِ الْمَرْءِ تَرْكُهُ مَا لَا يَعْنِيهِ"
"इंसान के इस्लाम की खूबी ये है कि वो उन चीज़ों को छोड़ दे जिन से उस का कोई ताल्लुक़ नहीं।" (तिरमिज़ी)

        ये नसीहत नामा उन लोगों के लिए है जो अपनी सलाहियतों को मुंतशिर करने के बजाए उन्हें सही सिम्ट में लगाना चाहते हैं। अल्लाह ताला हम सब को लग्वियात  और  दूसरों के मामलात में मुदाख़लत करने से बचने की तौफ़ीक़ अता फरमाए 
आमीन!

अज़ क़लम: ज़ा-शेख