रोज़ा और नीयत—अहम फ़िक़ही नुकात
रमज़ानुल मुबारक में रोज़ा एक अज़ीम इबादत है, मगर इस इबादत की बुनियाद नीयत पर कायम है। अहले इल्म फरमाते हैं कि नीयत दिल के इरादे का नाम है, ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं, मगर दिल में यह तय होना लाज़िम है कि मैं अल्लाह तआला की रज़ा के लिए रोज़ा रख रहा हूँ।आम तौर पर लोगों में यह गलत फहमी पाई जाती है कि अगर सहरी में नीयत के अल्फाज़ न कहे जाएं तो शायद रोज़ा न हो। हालांकि फ़िक़ही उसूल यह है कि अगर इंसान ने दिल में रोज़ा रखने का पुख्ता इरादा कर लिया, तो नीयत हो गई। सहरी करना खुद इस बात की अलामत है कि नीयत मौजूद है।
उलमा यह भी वाज़ेह फरमाते हैं कि फर्ज़ रोज़े, खास तौर पर रमज़ान के रोज़े की नीयत रात में या फज्र से पहले होनी चाहिए। अलबत्ता अगर किसी ने फज्र के बाद, दिन के आगाज में, इस हाल में नीयत कर ली कि उसने अब तक रोज़े के खिलाफ कोई काम नहीं किया, तो फ़िक़ह की रू से रोज़ा दुरुस्त हो जाता है। यह शरीयत की आसानी और रहमत का मज़हर है।
एक और अहम बात जिस की तरफ अहले इल्म तवज्जो दिलाते हैं वह यह है कि नीयत में तरद्दुद या शक रोज़े को कमज़ोर कर देता है। अगर इंसान यह सोचता रहे कि “पता नहीं रोज़ा रखूंगा या नहीं”, तो ऐसी कैफ़ियत में इबादत का कमाल बाकी नहीं रहता। रोज़ा यकीन, इखलास और अल्लाह पर एतमाद का नाम है।
इसी तरह बाज़ लोग रोज़े को महज आदत या मुआशरती रस्म समझ कर रखते हैं, जबकि उलमा फरमाते हैं कि नीयत में इबादत का शऊर होना ज़रूरी है। जब दिल में यह एहसास हो कि मैं अल्लाह के हुक्म पर अमल कर रहा हूँ, तभी रोज़ा इंसान की इस्लाह और तरबियत का जरिया बनता है।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि हम रोज़े की नीयत को मामूली न समझें। नीयत इबादत की रूह है, और रूह के बगैर अमल महज एक ज़ाहिरी सूरत रह जाता है। इल्म के साथ नीयत, और नीयत के साथ इखलास—यही वह रास्ता है जो रोज़े को अल्लाह के हां मकबूल बनाता है।
अल्लाह तआला हमें सही नीयत, सच्ची इबादत और कुबूलियत की तौफीक अता फरमाए। आमीन।