ज़िक्र-ए-ज़ुल्म
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ज़ालिम असामी की सबसे बड़ी क्वालिफिकेशन खस्त है, अगर आप कमीने नहीं हैं तो ज़ालिम के मनसब को क्वालिफाई नहीं करते, ज़ालिम यह इतमिनान खूब कर लेता है कि फरीक मुखालिफ दस्त बस्ता, बेबस, लावारिस और बे मुंह है, रद्द-ए-अमल का इमकान नहीं, फिर वह अरमान निकालता है, एक साहब तैश के लिए मारूफ थे, छोटों पर इश्तियाल बेकाबू रहता था, एक रोज़ वह आम ड्राइवर पर सीधे हो गए, ड्राइवर भी आज़ाद था, वह भी बिगड़ गया, यह रंग देखकर साहब फौरन तिफ्ल-ए-मासूम बन गए।

 हमारी मस्जिद के एक ज़िम्मेदार तंदखू हैं, आए दिन अमले से उलझते हैं, एक दिन मरहूम मुअज़्ज़िन को डांट पिला रहे थे, वह कदीम-उज़-ज़मान खादिम था, उसे सीनियरिटी याद आ गई, फिर उसने जो मकामी दकनी ज़बान में जुमलों की गेंद उसी कुव्वत से लौटाई तो दिमाग दुरुस्त हो गया, बैंगलोर की मकामी ज़बान लिसानियात का अज़ीम बाब है, बहुत से मानी में उर्दू पर भारी है, इसकी निसाई फसल हैरत अंगेज़ है और लड़ाई की ज़बान तो तासीर व अदा में ज़बानों की मां है, करीब से देखोगे तो अपनी उर्दू की बालादस्ती का ज़ोम मुतवाज़िन हो जाएगा, यहां की ज़बान में बला की बलागत है।

खैर! मज़मून आवारा हो गया, तो ज़ालिम तबियत के लिहाज़ से बेहतर नहीं होता, वह मज़लूम की किसी कमज़ोरी का फायदा उठाता है, यहां हमारी कुव्वत-ए-तफ्कीर दूर दराज़ गश्त लगाएगी; जब कि यह सुतूर कारी को नज़दीकी सियाक में रखना चाहती हैं, हमारे साबके में दो रिश्ते हैं: शागिर्दी और निस्बत-ए-वालिदियत, इन दोनों ताल्लुकात में हम बैयने उसी कम जर्फी का मुज़ाहिरा करते हैं जो हमें सरकारी सतह पर शनीअ दिखाई देती है, उस्ताद अपने मजबूर शागिर्द का फायदा उठाता है और उसे सिर्फ इसलिए मारता है कि रद्द-ए-अमल का न आना हतमी है, यही फितरत-ए-बद वालिदैन को या उनमें से एक को ज़ुल्म का हौसला देती है, वह बच्चे को ज़बानी, ज़ेहनी और जिस्मानी अज़ियत देने में सिर्फ इसलिए जरी हैं कि आज़ादी महसूस करते हैं, बाज़ वालिदैन के तजावुज़ को देखकर ख्याल गुज़रा कि मगरीबी मुमालिक ने वालिदैन की जर्ब के खिलाफ जो कानून साज़ी की है वह पूरे तौर पर बे महल नहीं, इंसान कमज़ोरी का फायदा उठाता है और इस फितरत में वह अपने बच्चे को भी इस्तस्ना नहीं देता।

औलाद की शादी में ताखीर भी वालिदैन के ज़ुल्म की मिसाल है, बिलखुसूस लड़कियों के तनाज़ुर में; क्यों कि हमारे माहौल में बेटियां बेज़बान हैं, वह वालिदैन की ताअत-ए-ज़ायद में अपनी खुशियों की कुर्बानी देती हैं, बाप खुद साख्ता मेयार के इंतजार में मुनासिब रिश्ते नज़र अंदाज़ करता है और बेटी की मुफ्त खिदमात लूटता है, जब उम्र मुतजाविज़ हो जाती है तो रिश्ते बंद हो जाते हैं, इब्तिदाई उम्र में रिश्ते मिन जानिब अल्लाह आते हैं, जो नाशुक्रि पर मौकूफ हो जाते हैं, इस मरहले पर शैतान उसे एक जुमला तलकीन करता है कि मेरी बेटी मेरे ऊपर बोझ नहीं है, यह तल्बीस है; क्यों कि शादी इसका निजी मामला नहीं था कि वह कुव्वत-ए-बरदाश्त जताए, यह बेटी का ज़ाती मामला है, आपने उसकी उमंगों का खून कर दिया, उसे लुत्फ-ए-ज़िंदगी से महरूम कर दिया और ज़्यादा ताखीर की सूरत में शायद औलाद से भी; क्यों कि एक उम्र के बाद कुव्वत-ए-तौलीद खत्म हो जाती है, फुकहा-ए-हनफिया दूर अंदेश हैं जो बालिग लड़की के फैसले-ए-निकाह को दुरुस्त कहते हैं, ज़ुल्म के लफ्ज़ पर हम हुकूमत-ए-ऐवानों में झांकने निकल जाते हैं; जब कि ज़ुल्म हमारे अतराफ रक्सान है; बल्कि हम खुद अपनी अमलदारी में ज़ालिम हैं, हत्ता कि बड़ी बुज़ुर्ग हस्तियां भी मुस्तस्ना नहीं।