*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*तृक-ए-लज़्ज़त का रूहानी सफर*
ज़िंदगी फ़क़त साँसों की आमद-ओ-रफ़्त का नाम नहीं, बल्कि यह एक न ख़त्म होने वाली आज़माइश है। एक मुसलसल कश्मकश, जिसमें इंसान हर लम्हा दो मुतज़ाद राहों के दरमियान मुअल्लक नज़र आता है।
एक राह, जो दिल की फ़रेब ख़ुर्दा ख़्वाहिशात की जानिब ले जाती है, और दूसरी, जो रब की रज़ा, सुकून-ए-क़ल्ब और रूहानी नजात की सिम्त बुलाती है।
कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जो आँखों को खैरा कर देते हैं, दिल को लुभाते हैं, मगर वही इंसान को ग़ुबार में ले जाने वाला होते हैं। और कुछ राहें ऐसी भी होती हैं जो आँखों को अश्कबार कर देती हैं, नफ़्स को ज़ख़्मी कर देती हैं, रुलाती हैं, लेकिन वही रूह को तस्कीन बख़्शती हैं जो किसी आरज़ी लज़्ज़त में मयस्सर नहीं।
नफ़्स सरगोशी करता है:
*बस एक बार...*
लेकिन दिल की गहराइयों से एक नूरानी सदा उभरती है:
*रब देख रहा है...*
यही वह लम्हा होता है जब तृक-ए-लज़्ज़त का असल रूहानी सफर शुरू होता है।
इंसान के बातिन में एक जंग छिड़ जाती है। ऐसी जंग, जो तलवार से नहीं, बल्कि सब्र, ज़ब्त-ए-नफ़्स और क़ुरबानी से लड़ी जाती है।
अपने बातिन की पुरकशिश आवाज़ों को ख़ामोश करना, अंदर की कमज़ोरियों और गुमराह कुन ख़्वाहिशात से लड़ना,
दरहक़ीक़त ज़िंदगी की सबसे बड़ी आज़माइश है।
और जो इस लम्ह-ए-आज़माइश में तृक-ए-लज़्ज़त का फ़ैसला करता है, वही इस रूहानी लज़्ज़त से आश्ना होता है जो किसी जिस्मानी लज़्ज़त में मुमकिन नहीं। यही सबसे अफ़ज़ल जिहाद है, जैसा कि हदीस-ए-मुबारका में आया है:
*"अफ़ज़ल उल जिहाद मन जाहद फ़ी नफ़्से ज़ात अल्लाह"*
*अनुवाद:* सबसे अफ़ज़ल जिहाद वह है जो अल्लाह की रज़ा के लिए नफ़्स के ख़िलाफ़ की जाए।
यह हदीस इस हक़ीक़त का एलान है कि इंसान का सबसे बड़ा मैदान-ए-जंग उसका अपना बातिन है।
तृक-ए-लज़्ज़त इस जिहाद की सबसे बुलंद तरीन शक्ल है, जब इंसान गुनाह के मौक़े रखते हुए, महज़ रब की रज़ा, अपनी आक़िबत की फ़लाह, और रूह की पाकीज़गी की ख़ातिर, गुनाह को तृक कर देता है।
तब वह अल्लाह के हुज़ूर नफ़्स की क़ुरबानी पेश कर रहा होता है।
यह क़ुरबानी आसान नहीं होती। दिल ज़ख़्मी होता है, आँखें अश्कबार हो जाती हैं, जज़्बात इज़्तिराब में घर जाते हैं।
ख़्वाहिशात की क़ुरबानी गोया जैसे कोई दहकता आतिश फ़िशाँ हो जिसे अंदर ही अंदर दबा दिया गया हो।
इस मुश्किल तरीन लम्हे में इंसान की रूह तज़्ज़बज़ुब की धुंध में लिपटी होती है।
नफ़्स अपनी तरफ़ खींचता है, मगर ईमान की रौशनी उसे रोक लेती है।
...यह लम्हा मामूली नहीं होता... कि इंसान अपने नफ़्स की ललकार, अपनी ख़्वाहिशात की सरगोशी को सिर्फ़ इसलिए ख़ामोश कर दे कि रब राज़ी हो जाए।
दिल ज़ख़्मी हो जाता है, आँखें भीग जाती हैं, मगर फिर...
दिल की गहराइयों से एक सिसकती, लरज़ती सदा उभरती है:
*ए रब्ब-ए-ज़ुलजलाल! तू देख रहा है ना?*🥹
*मैं सिर्फ़ तेरे लिए छोड़ रही हूँ...*
और फिर...
वह *लज़्ज़त* छोड़ी गई,
वह *लम्हा* गुज़रा,
वह *क़ुरबानी* दी गई...
रब उसे राएगाँ नहीं जाने देता।
अल्लाह बंदे के दिल में एक ऐसी लज़्ज़त, एक बातिनी सरवर, और एक बेमिसाल सुकून डाल देता है जो दुनिया की किसी लज़्ज़त से मुवाज़ना नहीं रखता।
दिल जो पहले ख़ाली महसूस होता था, अब लबरेज़ हो जाता है।
ज़मीर जैसे मुस्कुरा कर कह रहा हो:
*"तूने दुरुस्त किया... तू कामयाब हुआ... रब तुझसे राज़ी है!"*
यही वह कैफ़ियत है जो इंसान के अंदर एक नूर भर देती है।
एक ऐसी राहत, जिसके सामने दुनिया की तमाम लज़्ज़तें हेच हैं। और यह राहत महज़ राहत नहीं, बल्कि नफ़्स पर फ़तह का इनाम है। यह वह कैफ़ है जो रात की तन्हाइयों में आँखों से अश्क बन कर बहता है, मगर दिल में नूर बन कर उतरता है।
लिहाज़ा, तृक-ए-लज़्ज़त का यह रूहानी सफर, दरहक़ीक़त वह नूरानी सिरात-ए-मुस्तक़ीम है जो हमें दुनिया की आरज़ी और फ़ानी ख़ुशियों की क़ैद से आज़ाद कर के, रब की रज़ा, दिल की तस्कीन, और रूहानी नजात की सिम्त गामज़न करता है।
*अल्लाहुम्मा इजअलना मिनल मुत्तक़ीन, वारज़ुकना तृक लिज़्ज़ात इद्दुन्या, व हलावत ताअतिक, वाग़फ़िर लना वारहमना।*
🖋️ *तालिबा-ए-सालिहात*