विद्यार्थी, ज्ञान-ए-नबूवत के वारिस
विद्यार्थी यानी ज्ञान के तालिब, वही ज्ञान जो अंबिया अलैहिस्सलाम की मीरास है, हासिल करने वाले किसी भी मुआशरे के वो मुअज्ज़ज़ अफ़राद होते हैं कि जो मुस्तक़बिल में अंबिया अलैहिस्सलाम के वारिसों के आला ओहदों पर फ़ाइज़ होंगे।
लिहाज़ा ये ज़रूरी है कि इल्म के इन तालिबों और अंबिया कराम के इन वारिसों के अंदर वो खुसूसियत मौजूद हों जो नबियों की खुसूसियत हैं। मसलन सच्चाई, ईमानदारी, हक़ गोई, बेबाक की बहादुरी, रहम दिली, इंसानियत नवाज़ी, इंसानियत पसंदी, बड़ों का एहतराम, छोटों से प्यार, सब से प्यार व मुहब्बत, कीना व बुग्ज़ से नफ़रत, वग़ैरा।
मगर आज अगर हम मुआशरे की तलबा व तालिबात पर नज़र डालें तो हमें इन में दर्ज बाला खुसूसियत का बड़ी हद तक फ़ुक़दान नज़र आता है। वो इम्तिहानात के दिनों में नक़ल कर के पास होने को कोई बुरा काम नहीं समझते। ख़ुदा जाने वो ये करके उस्ताद को धोखा देते हैं या खुद को। वो न असातिज़ा की क़द्र करते हैं और न ही वालिदैन का एहतराम। उन के नज़दीक उस्ताद व शागिर्द का मुहतरेम व पाकीज़ा रिश्ता भी महज़ एक तिजारत की तरह हो गया है कि हम ने फीस अदा की है और टीचर हमें इल्म दे रहा है, हम पर कोई एहसान नहीं कर रहा। वालिदैन की नसीहतें उन्हें दकियानूसी बातें लगती हैं, रिश्तेदार उन की तरक़्क़ी में हाइल बड़ी रुकावटें हैं, जिन से मुलाक़ात करना भी वक़्त का ज़िया है। जब असातिज़ा, वालिदैन और रिश्तेदारो के साथ उन का ये रवैया है तो दीगर बड़ों के साथ उन के रवैया के का इदराक आप खुद कर सकते हैं।
फिर जब आप उन से सवाल करें कि आख़िर आप तालीम हासिल क्यों कर रहे हैं? तो इन में से बड़ी अक्सरियत का जवाब होगा किसी बड़ी कंपनी या फर्म में जॉब हासिल करने के लिए ताकि हमें अच्छी तनख़्वाह मिले और हम एक खुशहाल ज़िंदगी गुज़ार सकें।
क्या हम 20-22 साल तालीम, नौकरी हासिल करने के लिए करते हैं? क्या किसी का नौकर बनने के लिए हमारे वालिदैन हमें चार पांच साल की उम्र में बड़े बड़े और महंगे तरीन स्कूलों में दाख़िल कराते हैं? क्या हमारे बचपन की मासूमियत और शरारतें और लड़कपन और नौजवानी के उमंगें और ख़्वाब किसी का नौकर बनने के लिए भेंट चढ़ा दिए जाते हैं? क्या हमारे मुआशरे में आज़ाद बच्चे नहीं बल्कि नौकर पैदा हो रहे हैं? नहीं ऐसा नहीं है अगर ऐसा होता तो तलबा व तालिबात के साथ नौकरों का रवैया इख़्तियार किया जाता और स्कूलों यूनिवर्सिटियों को ग़ुलामों और नौकरों को पैदा करने वाले अड्डा के तौर पर देखा जाता शायद बिलवास्ता देखा भी जा रहा है।
मगर क्या दर हक़ीक़त इन आली शान और आलमी शोहरत याफ़्ता यूनिवर्सिटियों की बुनियाद और तामीर का मक़सद वक़्त के नौकरों और ग़ुलामों को पैदा करना है? नहीं हरगिज़ नहीं, इन यूनिवर्सिटियों का मक़सद क़ौम के रहबरान और रहनुमाओं की तरबियत करना है, यहां क़ौम के मेमार तरबियत पाते हैं। ये यूनिवर्सिटियां और कॉलेज बेहतरीन इंसानों की तरबियत गाहें हैं।
यहां परवान चढ़ने वाले मुहतरेम अफ़राद की कांधों पर अक़वाम आलम की तरबियत नो की ज़िम्मेदारियां हैं। यहां तैयार होने वाले अज़ीम इंसानों को इंसानियत के लिए बेहतरीन मिसालें बनना है। इन की ज़िंदगी सिर्फ अपनी ज़ात तक महदूद नहीं होनी चाहिए बल्कि इन की ज़िंदगी का मक़सद लोगों को ज़िंदगी के असल मक़ासिद से हम किनार कराना होना चाहिए।
उन्हें सदाक़त का अलबर्दार और इस्लाम का सिपाही बनना है। उन्हें इंसानियत पसंद और इंसानियत नवाज़ मुआशरे की तामीर नो करनी है। उन्हें अपने किरदार व आमाल से लोगों को इस्लाम की असल रूह से मुतारिफ़ कराना है। इस दुनिया को अमन का गहवारा बनाना है।
लिहाज़ा ये ज़रूरी है कि हम अभी से अपनी तालीम के साथ साथ तरबियत पर भी ध्यान दें और अपने अंदर वो खुसूसियत पैदा करें जो अज़ीम अफ़राद और बेहतरीन इंसानों की पहचान हैं यानी अख़लाक़-ए-करीमा और औसाफ़-ए-अज़ीमा।
शायर मशरिक़ अल्लामा इक़बाल ने क्या खूब फ़रमाया है
सबक़ फिर पढ़ सदाक़त का, अदालत का, शुजाअत का
लिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत का